भारत सरकार की टेलीकॉम विंग बीएसएनल बंद होने के कगार पर है? देश की सबसे बड़ी टेलीकॉम कंपनियों में से एक बीएसएनल नुकसान में चल रही है. रिपोर्ट के मुताबिक सरकार ने कंपनी से सभी ऑप्शन तलाशने को कहा है. इनमें कंपनी को बंद करने का भी ऑप्शन है. कुल मिला कर रिपोर्ट्स के मुताबिक अगर सभी ऑप्शन्स फेल होते हैं तो मुमकिन है बीएसएनल को बंद करना पड़े या सरकार इसे बेच दे.
टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट के मुताबिक सरकार बीएसएनल को दिया गया ये आदेश, कंपनी के आला अधिकारी और टेलीकॉम सेकरेटरी अरूण सुंदरराजन की मुलाकात के बाद आया है. रिपोर्ट के मुताबिक बीएसएनल के चेयरमैन अनुपम श्रीवास्तव ने इस मीटिंग में कंपनी के मौजूदा आर्थिक हालात के बारे में बातचीत की है. इसमें कंपनी को हुए नुकसान और जियो की एंट्री से पड़े प्रभाव के बारे में बातचीत की गई हैं.
सरकार के अधिकारियों ने बीएसएनल से एक नोट तैयार करने को कहा है कि अगर बिजनेस बंद हो जाएगा तो क्या होगा. दूसरे ऑप्शन के तौर पर सरकार बीएसएनल के रिवाइवल के लिए इसका विनिवेश कर सकती है. बीएसएनल को इन सभी ऑप्शन्स पर कॉम्पैरिटिव अनालिसिस जमा करने को कहा गया है.
गौरतलब है कि बीएसएनल भारत में, लैंडलाइन और ब्रॉडबैंड सर्विस सहित बैंडविथ का बिजनेस करती है. इसने 2016-17 में 4,793 करोड़ रुपये का नुकसान दिखाया है. हालांकि अब तक 2017-18 की आर्थिक स्थिति नहीं बताई गई है. पिछले तीन साल से लगातार बीएसएनल नुकसान में है. डिपार्टमेंट ऑफ पब्लिक एंटरप्राइजेज द्वारा जारी की गई गाइडलाइन के मुताबिक बीएसएनल को ‘Incipient Sick’ घोषित किया गया है.
बीएसएनल के एक प्रवक्ता ने TOI को बताया है, ‘बीएसएनल ने सरकार से कहा है कि मार्केट में ‘कट थ्रोट’ कॉम्पटीशन के अलावा कंपनी बढ़ती उम्र वाले ज्यादा कर्मचारियों की वजह से मुश्किल में है. अगर 2019-20 से रिटायरमेंट की आयु कम दी जाती है तो बिल में लगभग 3,000 करोड़ रुपये की बचत होगी’
पिछले कुछ सालों से बीएसएनल का स्ट्रगल ज्यादा बढ़ गया है. इसकी वजह मार्केट में जियो की आमद है. जियो के साथ ही लगभग सभी प्राइवेट कंपनियों ने अपने प्लान सस्ते कर दिए. कई कंपनियां मर्ज हो गईं, कुछ कंपनियां बाजार से साफ हो गई और ऐसे में मार्केट में बने रहने के लिए बीएसनएल ने भी अपने प्लान को रिलायंस जियो से मैच किया है. हालांकि बीएसएनल पिछले कुछ साल में दूसरे कंपनियों के मुकाबले 4G अपग्रेड में फेल रही है और फाइबर सर्विस देने में भी कंपनी ने दूसरों के मुकाबले कुछ देरी कर दी है.
हालांकि अभी फैसला नहीं हुआ है कि गुर्जर इस बात पर राजी होकर रेलवे ट्रैक और हाईवे से उठ जाएंगे, क्योंकि पहली बार मुख्यमंत्री के रूप में अशोक गहलोत ने 2015 में गुर्जरों को 5 फीसदी आरक्षण दिया था, जिस पर हाई कोर्ट ने रोक लगा दी थी. उसके बाद वसुंधरा सरकार आई तो 2017 में गुर्जरों को आरक्षण दिया गया. उस पर भी राजस्थान हाई कोर्ट ने रोक लगा दी. राजस्थान सरकार इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट गई है और वहां पर सुनवाई चल रही है.
50 से ज्यादा फीसदी तक आरक्षण नहीं
इस बीच 2018 में कांग्रेस की सरकार फिर से आ गई और गुर्जर फिर से आरक्षण की मांग को लेकर पटरी पर बैठ गए. अशोक गहलोत ने समाधान का वही तरीका निकाला और एक बार फिर से 2019 में गुर्जरों को आरक्षण देने का विधानसभा में पारित करवा दिया. राजस्थान विधानसभा में गुर्जरों का आरक्षण विधेयक पारित तो होता है, लेकिन हर बार अटक जाता है. कोर्ट का कहना है कि आरक्षण की कुल सीमा 50 से ज्यादा नहीं हो सकती है, लिहाजा गुर्जरों को आरक्षण नहीं दिया जा सकता है.
Wednesday, February 13, 2019
Wednesday, February 6, 2019
न्यूज़ीलैंड के हाथों टी-20 में भारत की सबसे बुरी हार
न्यूज़ीलैंड ने भारत को सिरीज़ के पहले टी-20 मैच में 80 रनों से हरा दिया है. ये टी-20 मैच में रनों से भारत की सबसे बुरी हार है.
न्यूज़ीलैंड के 219 रन के जवाब में भारत की पूरी टीम 139 रन बनाकर आउट हो गए. महेंद्र सिंह धोनी ने सर्वाधिक 39 रन बनाए.
न्यूज़ीलैंड की ओर से टिम साउदी ने सर्वाधिक तीन विकेट लिए.
भारत की शुरुआत काफ़ी ख़राब रही और कप्तान रोहित शर्मा सिर्फ़ एक रन बनाकर आउट हो गए.
इसके बाद शिखर धवन और विजय शंकर ने कुछ अच्छे शॉट्स लगाए. लगा जैसे भारतीय पारी संभल जाएगी
लेकिन फिर एक के बाद एक विकेट गिरना शुरू हो गए. भारत ने अपने छह विकेट 77 रन पर गँवा दिए थे.
शिखर धवन ने 29 और विजय शंकर ने 27 रनों की पारी खेली. ऋषभ पंत ने चार, दिनेश कार्तिक ने पाँच और हार्दिक पंड्या ने चार रन बनाए.
सातवें विकेट के लिए महेंद्र सिंह धोनी और क्रुणाल पंड्या के बीच 52 रनों की साझेदारी हुई. लेकिन लक्ष्य इतना बड़ा था कि आवश्यक रन गति 20 से ज़्यादा हो गई थी.
क्रुणाल पंड्या 20 रन बनाकर आउट हुए. जबकि भुवनेश्वर कुमार एक रन बनाकर आउट हो गए.
इससे पहले निर्धारित 20 ओवरों में न्यूज़ीलैंड ने छह विकेट पर 219 रन बनाए थे.
भारतीय टीम के कप्तान रोहित शर्मा ने टॉस जीतकर पहले गेंदबाज़ी का फ़ैसला किया. पहले खेलने आई न्यूज़ीलैंड टीम की शुरुआत बेहद मज़बूत रही.
न्यूज़ीलैंड की ओर से सलामी बल्लेबाज़ टिम सिफ़र्ट ने सबसे अधिक 84 रन बनाए. शतक की ओर बढ़ रहे सिफ़र्ट को ख़लील अहमद ने 13वें ओवर में क्लीन बोल्ड किया.
सिफ़र्ट के बाद कॉलिन मुनरो और के.एस. विलियमसन ने 34-34 रन बनाए. इनके अलावा कोई भी बल्लेबाज़ कोई बड़ा स्कोर नहीं बना पाया.
भारतीय टीम की ओर से सबसे अधिक दो विकेट हार्दिक पंड्या ने लिए जबकि भुवनेश्वर कुमार, ख़लील अहमद, क्रुणाल पंड्या और युजवेंद्र चहल ने एक-एक विकेट लिया.
भारतीय टीम को सबसे पहली सफलता नौवें ओवर में क्रुणाल पंड्या ने दिलाई. उन्होंने मुनरो को विजय शंकर के हाथों कैच आउट कराया.
दूसरा विकेट 13वें ओवर में सिफ़र्ट का गिरा. इसके बाद 15वें ओवर की अंतिम गेंद पर हार्दिक पंड्या ने डेरिल मिचेल (8 रन) को कैच आउट कराया.
16वें ओवर में विलियमसन के रूप में चौथा विकेट गिरा, उनको युजवेंद्र चहल ने कैच आउट कराया.
न्यूज़ीलैंड के 219 रन के जवाब में भारत की पूरी टीम 139 रन बनाकर आउट हो गए. महेंद्र सिंह धोनी ने सर्वाधिक 39 रन बनाए.
न्यूज़ीलैंड की ओर से टिम साउदी ने सर्वाधिक तीन विकेट लिए.
भारत की शुरुआत काफ़ी ख़राब रही और कप्तान रोहित शर्मा सिर्फ़ एक रन बनाकर आउट हो गए.
इसके बाद शिखर धवन और विजय शंकर ने कुछ अच्छे शॉट्स लगाए. लगा जैसे भारतीय पारी संभल जाएगी
लेकिन फिर एक के बाद एक विकेट गिरना शुरू हो गए. भारत ने अपने छह विकेट 77 रन पर गँवा दिए थे.
शिखर धवन ने 29 और विजय शंकर ने 27 रनों की पारी खेली. ऋषभ पंत ने चार, दिनेश कार्तिक ने पाँच और हार्दिक पंड्या ने चार रन बनाए.
सातवें विकेट के लिए महेंद्र सिंह धोनी और क्रुणाल पंड्या के बीच 52 रनों की साझेदारी हुई. लेकिन लक्ष्य इतना बड़ा था कि आवश्यक रन गति 20 से ज़्यादा हो गई थी.
क्रुणाल पंड्या 20 रन बनाकर आउट हुए. जबकि भुवनेश्वर कुमार एक रन बनाकर आउट हो गए.
इससे पहले निर्धारित 20 ओवरों में न्यूज़ीलैंड ने छह विकेट पर 219 रन बनाए थे.
भारतीय टीम के कप्तान रोहित शर्मा ने टॉस जीतकर पहले गेंदबाज़ी का फ़ैसला किया. पहले खेलने आई न्यूज़ीलैंड टीम की शुरुआत बेहद मज़बूत रही.
न्यूज़ीलैंड की ओर से सलामी बल्लेबाज़ टिम सिफ़र्ट ने सबसे अधिक 84 रन बनाए. शतक की ओर बढ़ रहे सिफ़र्ट को ख़लील अहमद ने 13वें ओवर में क्लीन बोल्ड किया.
सिफ़र्ट के बाद कॉलिन मुनरो और के.एस. विलियमसन ने 34-34 रन बनाए. इनके अलावा कोई भी बल्लेबाज़ कोई बड़ा स्कोर नहीं बना पाया.
भारतीय टीम की ओर से सबसे अधिक दो विकेट हार्दिक पंड्या ने लिए जबकि भुवनेश्वर कुमार, ख़लील अहमद, क्रुणाल पंड्या और युजवेंद्र चहल ने एक-एक विकेट लिया.
भारतीय टीम को सबसे पहली सफलता नौवें ओवर में क्रुणाल पंड्या ने दिलाई. उन्होंने मुनरो को विजय शंकर के हाथों कैच आउट कराया.
दूसरा विकेट 13वें ओवर में सिफ़र्ट का गिरा. इसके बाद 15वें ओवर की अंतिम गेंद पर हार्दिक पंड्या ने डेरिल मिचेल (8 रन) को कैच आउट कराया.
16वें ओवर में विलियमसन के रूप में चौथा विकेट गिरा, उनको युजवेंद्र चहल ने कैच आउट कराया.
Monday, February 4, 2019
ऑस्ट्रेलिया में अब तक की सबसे बड़ी बाढ़, 20 हजार घर खतरे में; सड़कों पर घूम रहे मगरमच्छ
उत्तर-पश्चिम ऑस्ट्रेलिया में जबर्दस्त बाढ़ से हजारों लोगों को घर छोड़कर जाना पड़ा है। 20 हजार घरों को खतरे में बताया गया है। रॉस रिवर डैम से प्रति सेकंड 1900 क्यूबिक मीटर पानी छोड़ा जा रहा है। अधिकारियों ने अगले कुछ दिनों में हालात और खराब होने की बात कही है। बाढ़ के पानी में बहकर मगरमच्छ सड़कों पर आ गए हैं। इसके मद्देनजर प्रशासन ने लोगों को अलर्ट रहने को कहा है।
एक शहर पानी-पानी
क्वींसलैंड राज्य के टाउंसविल शहर में हर जगह पानी भर गया है। शहर में बिजली नहीं है। कई लोग अपने घरों की छतों पर रह रहे हैं। क्वींसलैंड के मौसम विभाग ने चेतावनी दी है कि बाढ़ के चलते हालात और खराब हो सकते हैं। शहर का संपर्क बाकी इलाकों से कट सकता है।
क्वींसलैंड की प्रीमियर एनास्तासिया पालास्जुक के मुताबिक, "ये 20 साल में एक बार नहीं, बल्कि 100 साल में एक बार होने वाली घटना है। अगले कुछ दिनों में भारी बारिश के साथ तेज हवाएं चल सकती हैं। मेरी लोगों से अपील है कि जरूरत पड़ने पर ही बाहर निकलें, अन्यथा घर पर रहें।"
7 न्यूज की रिपोर्ट के मुताबिक, सैकड़ों घरों को खाली करा लिया गया है। 10 से 20 हजार घरों पर खतरा है। मिलिट्री ने स्थानीय लोगों को रेत की बोरियां बांटी हैं ताकि उनका पानी से बचाव हो सके।
मौसम विज्ञानी जोनाथन हो के मुताबिक, इस इलाके में साल में 2 मीटर बारिश होती है, लेकिन कुछ कस्बों में सालभर की बारिश हो चुकी है। इंघम कस्बे में बीते 24 घंटे में 50.6 सेमी पानी बरस गया। यहां एक घंटे में ही 14.5 सेमी बारिश हो गई।
टाउंसविल में रहने वाले क्रिस ब्रुकहाउस कहना है कि हमने पहले ऐसा कभी नहीं देखा। चारों तरफ पानी ही पानी दिख रहा है। घर में एक मीटर से ज्यादा पानी घुस चुका है। सीढ़ियां डूब चुकी हैं। फ्रिज समेत दूसरे सामान तैर रहे हैं।
बीजेपी का वोट शेयर बढ़ा
बता दें कि 2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी 17 फीसदी वोटों के साथ दो सीटें जीतने में सफल रही थी. लेफ्ट को भी दो सीटें मिली थी, जबकि 2009 की तुलना में उसे 13 सीटों का नुकसान हुआ था. जबकि बीजेपी को एक सीट का फायदा हुआ था. 2016 में हुए विधानसभा चुनाव में बीजेपी 6 फीसदी वोटों की बढ़ोत्तरी के साथ 10 फीसदी वोट पाने में सफल रही थी. बीजेपी के तीन विधायक जीतने में सफल रहे. जबकि उसके गठबंधन को 6 सीटें मिलीं. इससे पहले बीजेपी का एक भी विधायक राज्य में नहीं था.
विवाद से दोनों का फायदा
दरअसल बीजेपी और लेफ्ट के बीच सिमटती जंग के चलते दोनों पार्टियों को फायदा नजर आ रहा है. विपक्षी दल जनवरी के बाद दो बार ममता के बैनर तले एकजुट हुए हैं. पिछले दिनों कांग्रेस सासंद मौसम नूर ने टीएमसी का दामन थाम लिया है. राज्य में करीब 27 फीसदी मुस्लिम वोट है, बीजेपी से सीधा मुकाबला होने पर ये वोट ममता के साथ खड़ा नजर आएगा. इस तरह से दोनों पार्टियां ताजा विवाद में अपना-अपना सियासी फायदा देख रही हैं.
एक शहर पानी-पानी
क्वींसलैंड राज्य के टाउंसविल शहर में हर जगह पानी भर गया है। शहर में बिजली नहीं है। कई लोग अपने घरों की छतों पर रह रहे हैं। क्वींसलैंड के मौसम विभाग ने चेतावनी दी है कि बाढ़ के चलते हालात और खराब हो सकते हैं। शहर का संपर्क बाकी इलाकों से कट सकता है।
क्वींसलैंड की प्रीमियर एनास्तासिया पालास्जुक के मुताबिक, "ये 20 साल में एक बार नहीं, बल्कि 100 साल में एक बार होने वाली घटना है। अगले कुछ दिनों में भारी बारिश के साथ तेज हवाएं चल सकती हैं। मेरी लोगों से अपील है कि जरूरत पड़ने पर ही बाहर निकलें, अन्यथा घर पर रहें।"
7 न्यूज की रिपोर्ट के मुताबिक, सैकड़ों घरों को खाली करा लिया गया है। 10 से 20 हजार घरों पर खतरा है। मिलिट्री ने स्थानीय लोगों को रेत की बोरियां बांटी हैं ताकि उनका पानी से बचाव हो सके।
मौसम विज्ञानी जोनाथन हो के मुताबिक, इस इलाके में साल में 2 मीटर बारिश होती है, लेकिन कुछ कस्बों में सालभर की बारिश हो चुकी है। इंघम कस्बे में बीते 24 घंटे में 50.6 सेमी पानी बरस गया। यहां एक घंटे में ही 14.5 सेमी बारिश हो गई।
टाउंसविल में रहने वाले क्रिस ब्रुकहाउस कहना है कि हमने पहले ऐसा कभी नहीं देखा। चारों तरफ पानी ही पानी दिख रहा है। घर में एक मीटर से ज्यादा पानी घुस चुका है। सीढ़ियां डूब चुकी हैं। फ्रिज समेत दूसरे सामान तैर रहे हैं।
बीजेपी का वोट शेयर बढ़ा
बता दें कि 2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी 17 फीसदी वोटों के साथ दो सीटें जीतने में सफल रही थी. लेफ्ट को भी दो सीटें मिली थी, जबकि 2009 की तुलना में उसे 13 सीटों का नुकसान हुआ था. जबकि बीजेपी को एक सीट का फायदा हुआ था. 2016 में हुए विधानसभा चुनाव में बीजेपी 6 फीसदी वोटों की बढ़ोत्तरी के साथ 10 फीसदी वोट पाने में सफल रही थी. बीजेपी के तीन विधायक जीतने में सफल रहे. जबकि उसके गठबंधन को 6 सीटें मिलीं. इससे पहले बीजेपी का एक भी विधायक राज्य में नहीं था.
विवाद से दोनों का फायदा
दरअसल बीजेपी और लेफ्ट के बीच सिमटती जंग के चलते दोनों पार्टियों को फायदा नजर आ रहा है. विपक्षी दल जनवरी के बाद दो बार ममता के बैनर तले एकजुट हुए हैं. पिछले दिनों कांग्रेस सासंद मौसम नूर ने टीएमसी का दामन थाम लिया है. राज्य में करीब 27 फीसदी मुस्लिम वोट है, बीजेपी से सीधा मुकाबला होने पर ये वोट ममता के साथ खड़ा नजर आएगा. इस तरह से दोनों पार्टियां ताजा विवाद में अपना-अपना सियासी फायदा देख रही हैं.
Friday, February 1, 2019
中共政治安全面临的九大挑战
进入2019年,中共对重大风险的警觉性骤然升高。习近平在省部级领导干部研讨班的开班讲话中强调要有底线思维,防范化解来自各个方面和领域的重大风险,确保政治、意识形态、科技、社会等安全。全国公安厅局长会议更是直接将“颜色革命”作为今年的主要挑战。中共此种风声鹤唳,严防死守是神经过敏的反应,还是他们直接感受到了危机就在眼前?
坦率地说,习近平上台后,中国社会积累了大量的问题,有些问题非常严峻,足以构成对中共政权的挑战和冲击。这些问题和挑战有:
(1)经济增速长期处于收缩通道。改革40年,中国大多数年份平均10%的增长构成了中共执政合法性的重要基础,然而最近几年,高增长不再,且经济下行的趋势在未来几年也难以得到缓解。中国今年的经济增速定在百分之6至6.5区间,就是一个严重信号。一些经济学家认为,就中国的国情言,未来经济增长不能低于6%,否则会出大问题。原因在于,虽然中国经济体量庞大,但仍需要有一定的增速去解决只有靠增长才能解决的问题。若经济增速过低,以前被高增长遮蔽的问题和矛盾就得以显露和激化,影响到就业、中央和地方财政收入、社会保障,以及其他各种支出,削弱中国政府解决问题的能力。
(2)收入分配不公和贫富分化不断加剧,相对剥夺感逼近人们的心理底线。40年改革虽然在绝对意义上提高了民众的收入和生活水平,但相对收入分配差距一直在扩大,这种情况近年尤其加剧,甚至影响到绝对收入的下降。中国的基尼系数早已突破国际公认的0.5心理防线。贫富分化不断恶化不但会制约中国的经济转型,也将产生严重的政治后果,如阶层对立,尤其是中产阶级的重新贫困化等。
(3)权贵利益集团的滋长与顽固。中国改革的一大后果是形成了大大小小的利益集团,而它们多半是以官商一体的形式出现的,权力全面渗透进经济和商业活动,形成了所谓的官家或权贵资本主义。中国政府的政策和决策,很大程度上被这些权贵利益集团所左右、影响和消解。习近平的反腐虽然打掉了其中的一些权贵集团,然而,他们的财富不过是转移到另一些权贵集团手里,民众并未得到财富转移的好处。
(4)乡村溃败与城市流民。中国是一个二元结构社会,二元结构表现在许多方面,其中最突出的就是城乡,城市的繁荣与农村的衰败形成了鲜明对比。虽然中国的城市化率最近几年增长很快,已经超过50%,一半多人口生活在城市,但这种城市化是虚假的、没有实质内容的城市化,原因是城市化以掠夺农村为代价,其城市化政策并未使过亿的城市农民享受政府普惠的公共服务。在经济困难时,这种情况更突出。从而在城市产生大量流民,长期看,将对中共基层政权的稳定和城市社会治安,带来严重挑战。
(5)社会分化与阶层对立。中国社会也呈现出高度分化和对立的特点。不仅城乡分化和对立,官民之间,底层民众与上层精英之间,乃至不同思想流派和知识分子之间,也产生严峻对立。上层的凝固化与下层的碎片化,官民的冲突,知识精英的相互拆台,使社会整合的难度空前加大,无疑不利中共统治。
(6)互联网政治。网络的出现特别是自媒体改变了中国社会的生态,提升了全民尤其是底层大众的民权意识,形成了中国特有的网络政治。网络揭丑和抗争虽然减少了民众广场运动的可能性,但由于网络传播的即时、扩散和放大效应,其压力同样不可小觑。目前,中共一方面加强对新媒体的管控,打压异议声音和网络媒体,将民众驱赶到广场;一方面用官方的新媒体引导舆论,但总体而言,其治理严重不适应互联网时代的现实。尽管阿拉伯之春没在中国出现,但未来不排除此种可能。
(7)民族矛盾急剧上升。中共民族政策未能做到与时俱进,经济的发展反而成为民族分裂的一个催化剂。在过去第三波民主潮流的影响下,中国的民族矛盾也以争取民主的形式出现,虽然这些年来中共对藏族、维族等民族的打压不遗余力,导致他们争民主的努力受挫,但民族分离运动也在这种打压中形成,挑战国家统一。
(8)腐败和政治认同的流失。腐败既是公权力滥用和国家治理失败的结果,同时亦会恶化大众对政权的认同。中共的腐败已经失控。虽然习近平发起了声势浩大的反腐运动,抓了许多高级官员,然而,并未能改善各级政府严重的信用赤字,官民和党群的对立进一步加深,裂痕进一步加大,这将瓦解中共的执政根基。
(9)地缘政治恶化。过去几年,由于习近平实行的一系列鲁莽的对外扩张政策,导致中国的外部环境和地缘政治恶化,特别是中美的全面较量和冲突使得中国和西方世界的矛盾空前紧张。外部环境的恶化会压缩中国的国际空间,导致经济的内卷化,并催生和激化国内已有的各种矛盾。如果未来地缘政治环境仍然处于紧张态势,无疑非常不利中共统治。
需要指出,上述问题和风险不是单一和单向作用,而是互相影响和强化,它们形成合力,构成对中共政权安全的重大挑战。尽管中共目前能够采取强力维稳手段将各种挑战政权的力量压制下去。但如果不能改善治理,在民主与法治的基础上重建合法性,靠镇压终非良策,而且事实上也不可能。
坦率地说,习近平上台后,中国社会积累了大量的问题,有些问题非常严峻,足以构成对中共政权的挑战和冲击。这些问题和挑战有:
(1)经济增速长期处于收缩通道。改革40年,中国大多数年份平均10%的增长构成了中共执政合法性的重要基础,然而最近几年,高增长不再,且经济下行的趋势在未来几年也难以得到缓解。中国今年的经济增速定在百分之6至6.5区间,就是一个严重信号。一些经济学家认为,就中国的国情言,未来经济增长不能低于6%,否则会出大问题。原因在于,虽然中国经济体量庞大,但仍需要有一定的增速去解决只有靠增长才能解决的问题。若经济增速过低,以前被高增长遮蔽的问题和矛盾就得以显露和激化,影响到就业、中央和地方财政收入、社会保障,以及其他各种支出,削弱中国政府解决问题的能力。
(2)收入分配不公和贫富分化不断加剧,相对剥夺感逼近人们的心理底线。40年改革虽然在绝对意义上提高了民众的收入和生活水平,但相对收入分配差距一直在扩大,这种情况近年尤其加剧,甚至影响到绝对收入的下降。中国的基尼系数早已突破国际公认的0.5心理防线。贫富分化不断恶化不但会制约中国的经济转型,也将产生严重的政治后果,如阶层对立,尤其是中产阶级的重新贫困化等。
(3)权贵利益集团的滋长与顽固。中国改革的一大后果是形成了大大小小的利益集团,而它们多半是以官商一体的形式出现的,权力全面渗透进经济和商业活动,形成了所谓的官家或权贵资本主义。中国政府的政策和决策,很大程度上被这些权贵利益集团所左右、影响和消解。习近平的反腐虽然打掉了其中的一些权贵集团,然而,他们的财富不过是转移到另一些权贵集团手里,民众并未得到财富转移的好处。
(4)乡村溃败与城市流民。中国是一个二元结构社会,二元结构表现在许多方面,其中最突出的就是城乡,城市的繁荣与农村的衰败形成了鲜明对比。虽然中国的城市化率最近几年增长很快,已经超过50%,一半多人口生活在城市,但这种城市化是虚假的、没有实质内容的城市化,原因是城市化以掠夺农村为代价,其城市化政策并未使过亿的城市农民享受政府普惠的公共服务。在经济困难时,这种情况更突出。从而在城市产生大量流民,长期看,将对中共基层政权的稳定和城市社会治安,带来严重挑战。
(5)社会分化与阶层对立。中国社会也呈现出高度分化和对立的特点。不仅城乡分化和对立,官民之间,底层民众与上层精英之间,乃至不同思想流派和知识分子之间,也产生严峻对立。上层的凝固化与下层的碎片化,官民的冲突,知识精英的相互拆台,使社会整合的难度空前加大,无疑不利中共统治。
(6)互联网政治。网络的出现特别是自媒体改变了中国社会的生态,提升了全民尤其是底层大众的民权意识,形成了中国特有的网络政治。网络揭丑和抗争虽然减少了民众广场运动的可能性,但由于网络传播的即时、扩散和放大效应,其压力同样不可小觑。目前,中共一方面加强对新媒体的管控,打压异议声音和网络媒体,将民众驱赶到广场;一方面用官方的新媒体引导舆论,但总体而言,其治理严重不适应互联网时代的现实。尽管阿拉伯之春没在中国出现,但未来不排除此种可能。
(7)民族矛盾急剧上升。中共民族政策未能做到与时俱进,经济的发展反而成为民族分裂的一个催化剂。在过去第三波民主潮流的影响下,中国的民族矛盾也以争取民主的形式出现,虽然这些年来中共对藏族、维族等民族的打压不遗余力,导致他们争民主的努力受挫,但民族分离运动也在这种打压中形成,挑战国家统一。
(8)腐败和政治认同的流失。腐败既是公权力滥用和国家治理失败的结果,同时亦会恶化大众对政权的认同。中共的腐败已经失控。虽然习近平发起了声势浩大的反腐运动,抓了许多高级官员,然而,并未能改善各级政府严重的信用赤字,官民和党群的对立进一步加深,裂痕进一步加大,这将瓦解中共的执政根基。
(9)地缘政治恶化。过去几年,由于习近平实行的一系列鲁莽的对外扩张政策,导致中国的外部环境和地缘政治恶化,特别是中美的全面较量和冲突使得中国和西方世界的矛盾空前紧张。外部环境的恶化会压缩中国的国际空间,导致经济的内卷化,并催生和激化国内已有的各种矛盾。如果未来地缘政治环境仍然处于紧张态势,无疑非常不利中共统治。
需要指出,上述问题和风险不是单一和单向作用,而是互相影响和强化,它们形成合力,构成对中共政权安全的重大挑战。尽管中共目前能够采取强力维稳手段将各种挑战政权的力量压制下去。但如果不能改善治理,在民主与法治的基础上重建合法性,靠镇压终非良策,而且事实上也不可能。
Thursday, January 24, 2019
नेता बनी प्रियंका गांधी के लिए मुश्किलें खड़ी कर सकते हैं पति रॉबर्ट वाड्रा के खिलाफ चल रहे केस
कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की बहन प्रियंका गांधी अब पार्टी में अहम जिम्मेदारी संभालने जा रही हैं. अभी तक राहुल गांधी के लिए पर्दे के पीछे रहकर काम करने वाली प्रियंका अब पूर्वी उत्तर प्रदेश की प्रभारी बनाई गई हैं. उन्हें सक्रिय राजनीति में लाने की मांग कांग्रेस में लंबे अर्से से चली आ रही थी. लेकिन ठीक आम चुनाव से पहले पार्टी ने प्रियंका को मैदान में उतार दिया है. उनके आने से कांग्रेस पार्टी में भारी उत्साह बना हुआ है. लेकिन पति रॉबर्ट वाड्रा से जुड़े मामले प्रियंका के लिए मुश्किलें खड़ी कर सकते हैं.
वर्ष 2014 में मोदी सरकार के आते ही गांधी परिवार के दामाद रॉबर्ट वाड्रा के लिए परेशानी का दौर शुरू हो गया था. उनके खिलाफ कई मामले उजागर हुए. जिनमें हरियाणा के गुडगांव और राजस्थान के बीकानेर में लैंड डील के अलावा ओंकारेश्वर प्रॉपर्टीज से जुड़े मामले और आयकर विभाग से संबंधित केस शामिल हैं. इन मामलों को लेकर हमेशा बीजेपी गांधी परिवार को घेरने की कोशिश करती रही. और कांग्रेस नेता उनके बचाव में खड़े होते रहे. हम आपको बताते हैं, रॉबर्ट वाड्रा से जुड़े दो बड़े मामलों के बारे में.
कोलायात लैंड डील
यह मामला राजस्थान के बीकानेर जिले का है. जो कोलायात की एक लैंड डील से जुड़ा है. दरअसल, हुआ यूं कि सेना के लिए महाजन फील्ड फायरिंग रेंज बनाई गई थी. उसकी वजह से विस्थापित हुए लोगों के लिए सरकार ने एक जमीन का चुनाव किया. जो उन लोगों को बांटी जानी थी. लेकिन उसमें से 270 बीघा जमीन को पहले 79 लाख में खरीदा गया और बाद में उसी जमीन को 3 साल के भीतर पांच करोड़ में बेच दिया गया. जब ये मामला खुला तो इसमें गांधी परिवार के दामाद यानी प्रियंका के पति रॉबर्ट वाड्रा का नाम सामने आया. उनके दो पार्टनर आशोक कुमार और महेश नागर के नाम भी इस मामले में उजागर हुए. इसके बाद वहां के तहसीलदार ने भी इस संबंध में फर्जीवाड़े की शिकायत की. मामले के तूल पकड़ने पर PMLA के तहत प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने वर्ष 2015 में केस दायर किया. इसी मामले में 2017 के दौरान ईडी ने रॉबर्ट वाड्रा के करीबियों के यहां छापेमारी की कार्रवाई को अंजाम दिया. बीते साल 30 नवबंर को ठीक राजस्थान विधान सभा के चुनाव से पहले प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने रॉबर्ट वाड्रा के खिलाफ समन जारी करते हुए, उन्हें बीकानेर लैंड डील केस में पूछताछ के लिए भी बुलाया था.
हरियाणा जमीन घोटाला
गुडगांव और अन्य स्थानों पर जमीन की खरीद फरोख्त से जुड़े घोटाले में जब रॉबर्ट वाड्रा का नाम आया तो हडकंप मचना लाजमी था. इस मामले में बड़ी अनियमितता उजागर हुई. हरियाणा से कांग्रेस की हुड्डा सरकार के पतन के बाद ये मामला सत्ताधारी बीजेपी ने खूब उछाला. जांच बैठाई गई और आखिरकार 1 सितंबर 2018 को प्रियंका गांधी के पति रॉबर्ट वाड्रा के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया गया. उस मुकदमें में हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री भूपिंदर सिंह हुड्डा को भी नामजद किया गया. इस चर्चित घोटाले के संबंध में वाड्रा और हुड्डा के खिलाफ आईपीसी की धारा 420, 120बी, 467, 468 और 471 के तहत मुकदमा दर्ज किया गया. यही नहीं उन दोनों के खिलाफ प्रिवेंशन ऑफ करप्शन एक्ट 1988 की धारा 13 के तहत भी कार्रवाई की गई. इस दौरान ED की टीम ने वाड्रा के कई ठिकानों पर एक साथ छापेमारी की कार्रवाई की थी.
IAS अशोक खेमका ने किया था खुलासा
जब हरियाणा लैंड कंसोलिडेशन डिपार्टमेंट से आईएएस अधिकारी अशोक खेमका की छुट्टी की गई तो उन्होंने चार्ज छोड़ने से ठीक पहले रॉबर्ट वाड्रा और रियल एस्टेट कंपनी DLF के बीच हुए सौदे (म्यूटेशन) रद्द कर दिया था. इसकी वजह बताते हुए खेमका ने अपनी रिपोर्ट में लिखा कि अगर निष्पक्ष जांच की जाए तो हरियाणा में की कांग्रेस शासनकाल के दौरान 20,000 करोड़ से 350 हजार करोड़ तक का लैंड घोटाला सामने आ सकता है. इन मामलों के उजागर होने पर बीजेपी समेत कई विरोधी दलों ने कांग्रेस पार्टी और गांधी परिवार को घेरने की कोशिश की थी. समय-समय पर रॉबर्ट से जुड़े मामलों को बीजेपी ने मुद्दा भी बनाया.
कई मामलों में आया था नाम
बीकानेर और गुड़गांव के अलावा, ओंकारेश्वर प्रॉपर्टीज के मामले भी रॉबर्ट वाड्रा के लिए परेशानी का सबब बने. उनकी कंपनियों के लाइसेंस में अनियमितता पाई गई थी. इससे पहले, रॉबर्ट वाड्रा को आयकर विभाग ने 42 करोड़ रुपये की अज्ञात आय के मामले में भी नोटिस थमा दिया था. यह मामला वाड्रा की कंपनी स्काईलाइट हॉस्पिटलिटी प्राइवेट लिमिटेड से जुड़ा था. इस कंपनी में रॉबर्ट की 99 फीसदी हिस्सेदारी है. यूपीए सरकार के कार्यकाल में 2जी और CWG से जुड़े कुछ मामलों में भी वाड्रा का नाम उछला था.
हालांकि ऐसे कई मामले थे, जिनमें वाड्रा को क्लीन चिट मिल गई. इन सभी मामलों में रॉबर्ट और गांधी परिवार सीधे तौर पर बोलने से बचता रहा है. लेकिन अब प्रियंका के सक्रिय राजनीति में आ जाने से ये मामले उनके लिए सियासी परेशानी के तौर पर सामने आएंगे. बीजेपी समेत विपक्षी दल रॉबर्ट वाड्रा के खिलाफ चल रहे मामलों को चुनाव में भी बड़ा मुद्दा बना सकते हैं. ऐसे में प्रियंका के लिए उनकी सियासी पारी की शुरूआत मुश्किलों भरी हो सकती है.
अमेरिकी अखबार का खुलासा
गौरतलब है कि जब 2014 में लोकसभा चुनाव चल रहे थे. ठीक उसी वक्त प्रतिष्ठित अमेरिकन अखबार वॉल स्ट्रीट जर्नल ने एक रिपोर्ट छापकर सनसनी फैला दी थी. उस रिपोर्ट में छपा था कि वर्ष 2007 में प्रियंका गांधी के पति रॉबर्ट वाड्रा ने महज 1 लाख रुपये से अपना कारोबार शुरू किया था. मगर साल 2012 तक उनकी जायदाद 300 करोड़ से भी ज्यादा हो गई थी. जबकि उस वक्त पूरी दुनिया आर्थिक मंदी से जूझ रही थी.
वर्ष 2014 में मोदी सरकार के आते ही गांधी परिवार के दामाद रॉबर्ट वाड्रा के लिए परेशानी का दौर शुरू हो गया था. उनके खिलाफ कई मामले उजागर हुए. जिनमें हरियाणा के गुडगांव और राजस्थान के बीकानेर में लैंड डील के अलावा ओंकारेश्वर प्रॉपर्टीज से जुड़े मामले और आयकर विभाग से संबंधित केस शामिल हैं. इन मामलों को लेकर हमेशा बीजेपी गांधी परिवार को घेरने की कोशिश करती रही. और कांग्रेस नेता उनके बचाव में खड़े होते रहे. हम आपको बताते हैं, रॉबर्ट वाड्रा से जुड़े दो बड़े मामलों के बारे में.
कोलायात लैंड डील
यह मामला राजस्थान के बीकानेर जिले का है. जो कोलायात की एक लैंड डील से जुड़ा है. दरअसल, हुआ यूं कि सेना के लिए महाजन फील्ड फायरिंग रेंज बनाई गई थी. उसकी वजह से विस्थापित हुए लोगों के लिए सरकार ने एक जमीन का चुनाव किया. जो उन लोगों को बांटी जानी थी. लेकिन उसमें से 270 बीघा जमीन को पहले 79 लाख में खरीदा गया और बाद में उसी जमीन को 3 साल के भीतर पांच करोड़ में बेच दिया गया. जब ये मामला खुला तो इसमें गांधी परिवार के दामाद यानी प्रियंका के पति रॉबर्ट वाड्रा का नाम सामने आया. उनके दो पार्टनर आशोक कुमार और महेश नागर के नाम भी इस मामले में उजागर हुए. इसके बाद वहां के तहसीलदार ने भी इस संबंध में फर्जीवाड़े की शिकायत की. मामले के तूल पकड़ने पर PMLA के तहत प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने वर्ष 2015 में केस दायर किया. इसी मामले में 2017 के दौरान ईडी ने रॉबर्ट वाड्रा के करीबियों के यहां छापेमारी की कार्रवाई को अंजाम दिया. बीते साल 30 नवबंर को ठीक राजस्थान विधान सभा के चुनाव से पहले प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने रॉबर्ट वाड्रा के खिलाफ समन जारी करते हुए, उन्हें बीकानेर लैंड डील केस में पूछताछ के लिए भी बुलाया था.
हरियाणा जमीन घोटाला
गुडगांव और अन्य स्थानों पर जमीन की खरीद फरोख्त से जुड़े घोटाले में जब रॉबर्ट वाड्रा का नाम आया तो हडकंप मचना लाजमी था. इस मामले में बड़ी अनियमितता उजागर हुई. हरियाणा से कांग्रेस की हुड्डा सरकार के पतन के बाद ये मामला सत्ताधारी बीजेपी ने खूब उछाला. जांच बैठाई गई और आखिरकार 1 सितंबर 2018 को प्रियंका गांधी के पति रॉबर्ट वाड्रा के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया गया. उस मुकदमें में हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री भूपिंदर सिंह हुड्डा को भी नामजद किया गया. इस चर्चित घोटाले के संबंध में वाड्रा और हुड्डा के खिलाफ आईपीसी की धारा 420, 120बी, 467, 468 और 471 के तहत मुकदमा दर्ज किया गया. यही नहीं उन दोनों के खिलाफ प्रिवेंशन ऑफ करप्शन एक्ट 1988 की धारा 13 के तहत भी कार्रवाई की गई. इस दौरान ED की टीम ने वाड्रा के कई ठिकानों पर एक साथ छापेमारी की कार्रवाई की थी.
IAS अशोक खेमका ने किया था खुलासा
जब हरियाणा लैंड कंसोलिडेशन डिपार्टमेंट से आईएएस अधिकारी अशोक खेमका की छुट्टी की गई तो उन्होंने चार्ज छोड़ने से ठीक पहले रॉबर्ट वाड्रा और रियल एस्टेट कंपनी DLF के बीच हुए सौदे (म्यूटेशन) रद्द कर दिया था. इसकी वजह बताते हुए खेमका ने अपनी रिपोर्ट में लिखा कि अगर निष्पक्ष जांच की जाए तो हरियाणा में की कांग्रेस शासनकाल के दौरान 20,000 करोड़ से 350 हजार करोड़ तक का लैंड घोटाला सामने आ सकता है. इन मामलों के उजागर होने पर बीजेपी समेत कई विरोधी दलों ने कांग्रेस पार्टी और गांधी परिवार को घेरने की कोशिश की थी. समय-समय पर रॉबर्ट से जुड़े मामलों को बीजेपी ने मुद्दा भी बनाया.
कई मामलों में आया था नाम
बीकानेर और गुड़गांव के अलावा, ओंकारेश्वर प्रॉपर्टीज के मामले भी रॉबर्ट वाड्रा के लिए परेशानी का सबब बने. उनकी कंपनियों के लाइसेंस में अनियमितता पाई गई थी. इससे पहले, रॉबर्ट वाड्रा को आयकर विभाग ने 42 करोड़ रुपये की अज्ञात आय के मामले में भी नोटिस थमा दिया था. यह मामला वाड्रा की कंपनी स्काईलाइट हॉस्पिटलिटी प्राइवेट लिमिटेड से जुड़ा था. इस कंपनी में रॉबर्ट की 99 फीसदी हिस्सेदारी है. यूपीए सरकार के कार्यकाल में 2जी और CWG से जुड़े कुछ मामलों में भी वाड्रा का नाम उछला था.
हालांकि ऐसे कई मामले थे, जिनमें वाड्रा को क्लीन चिट मिल गई. इन सभी मामलों में रॉबर्ट और गांधी परिवार सीधे तौर पर बोलने से बचता रहा है. लेकिन अब प्रियंका के सक्रिय राजनीति में आ जाने से ये मामले उनके लिए सियासी परेशानी के तौर पर सामने आएंगे. बीजेपी समेत विपक्षी दल रॉबर्ट वाड्रा के खिलाफ चल रहे मामलों को चुनाव में भी बड़ा मुद्दा बना सकते हैं. ऐसे में प्रियंका के लिए उनकी सियासी पारी की शुरूआत मुश्किलों भरी हो सकती है.
अमेरिकी अखबार का खुलासा
गौरतलब है कि जब 2014 में लोकसभा चुनाव चल रहे थे. ठीक उसी वक्त प्रतिष्ठित अमेरिकन अखबार वॉल स्ट्रीट जर्नल ने एक रिपोर्ट छापकर सनसनी फैला दी थी. उस रिपोर्ट में छपा था कि वर्ष 2007 में प्रियंका गांधी के पति रॉबर्ट वाड्रा ने महज 1 लाख रुपये से अपना कारोबार शुरू किया था. मगर साल 2012 तक उनकी जायदाद 300 करोड़ से भी ज्यादा हो गई थी. जबकि उस वक्त पूरी दुनिया आर्थिक मंदी से जूझ रही थी.
Wednesday, January 16, 2019
'कूल' धोनी ने ऐसा क्या कर दिया कि ये VIDEO हो गया वायरल
ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ मौजूदा वनडे सीरीज में महेंद्र सिंह धोनी अपने पुराने रंग में लौट चुके हैं. एडिलेड में उन्होंने एक छोर संभाला और 54 गेंदों में नाबाद 55 रनों की पारी खेलकर भारत को छह विकेट से जीत दिला दी. जिससे टीम इंडिया ने तीन मैचों की सीरीज में 1-1 से बराबरी हासिल कर ली है, लेकिन मैच के दौरान बल्लेबाजी करते हुए 'कूल' धोनी आपा खोते नजर आए.
दरअसल, भारतीय पारी के दौरान खलील अहमद और युजवेंद्र चहल मैदान पर ड्रिंक्स लेकर आए थे. इस बीच खलील ने एक गलती कर दी. वह पिच पर दौड़ गए. इस पर धोनी गुस्से में आ गए और उन्होंने खलील को ऐसा न करने की नसीहत देते हुए 'कुछ ऐसा कहा' कि उनका वीडिया वायरल हो गया.
ऐसा पहली बार नहीं, जब पूर्व कप्तान धोनी मैदान पर अपने साथी खिलाड़ी पर भड़कने से सुर्खियों में आए. इससे पहले फरवरी 2018 में उन्होंने दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ टी-20 मैच के दौरान मनीष पांडे को 'डांट' लगाई थी.
तब हुआ यूं था कि मैच के आखिरी ओवर में धोनी स्ट्राइक पर थे, उन्होंने स्कोर बोर्ड की ओर देख रहे मनीष पांडे को डांट लगाई थी. उन्होंने मनीष पांडे से कहा था- ओए, उधर क्या देख रहा, इधर देख ले... धोनी का ये वीडियो भी सोशल मीडिया पर वायरल हुआ था.
राष्ट्रीय स्तर पर जिस तरह की राजनीतिक तस्वीर फिलहाल बनी हुई है, उसमें कांग्रेस समेत विपक्ष में खड़े सभी क्षेत्रीय दल गठबंधन में चुनाव लड़ने की कोशिश कर रहे हैं. बिहार और उत्तर प्रदेश में गठबंधन की घोषणा भी की जा चुकी है. इन्हीं सरगर्मियों के बीच दिल्ली में यह कयास लगाए गए कि क्या लोकसभा चुनाव में कांग्रेस अपने प्रतिद्वंद्वी नई नवेली आम आदमी पार्टी से गठबंधन करेगी? सियासी गलियारे में इसकी सुगबुगाहट सुनने को मिली की कांग्रेस इस पर विचार कर सकती है. लेकिन सवाल है कि क्या कांग्रेस आम आदमी पार्टी से गठबंधन करेगी? उस आम आदमी पार्टी से, जो कांग्रेस के खिलाफ भ्रष्टाचार को लेकर चले आंदोलन की गर्भ से पैदा हुई है. भ्रष्टाचार विरोधी अन्ना आंदोलन से न सिर्फ आम आदमी पार्टी पैदा हुई बल्कि विधानसभा चुनावों में उसने कांग्रेस को अर्श से फर्श पर ला खड़ा किया और पार्टी का कोई इकलौता उम्मीदवार विधायक नहीं चुना जा सका.
आम आदमी पार्टी से मिली सियासी चोट को दिल्ली की कमान संभाल चुके अजय माकन संभवतः बखूबी महसूस कर रहे होंगे. इसलिए वह आम आदमी पार्टी से गठबंधन के खिलाफ थे. पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह भी अपने राज्य में अरविंद केजरीवाल से दोस्ती को हरी झंडी दिखाने से मना कर चुके हैं. शीला दीक्षित भी इसके खिलाफ ही नजर आत रही हैं. ‘आजतक’ से एक बातचीत में वह कहती हैं, ‘कांग्रेस अपने आप में सक्षम है. हमें किसी से गठबंधन करने की कोई आवश्यकता नहीं है. आम आदमी पार्टी का जो रिकॉर्ड रहा है, वो हमें प्रेरित नहीं करता है. हमने कभी भी आम आदमी पार्टी का समर्थन नहीं किया. उसने हमारे खिलाफ चुनाव लड़ा.’
मगर कहा यह भी जाता है कि राजनीति में कुछ भी मुमकिन है क्योंकि यहां कोई स्थायी दुश्मन या स्थायी जैसी कोई चीज नहीं होती है. अगर ये सूरत बने कि दिल्ली में लोकसभा चुनावों के लिए कांग्रेस को आम आदमी पार्टी से गठबंधन करना पड़ जाए तो फिर सवाल होगा है कि विधानसभा चुनाव में क्या? क्या दोनों दल एक साथ चुनावी मैदान में उतरेंगे? या फिर दोनों की राहें जुदा होंगी?
उम्र के इस पड़ाव पर कितनी कारगर होंगी दीक्षित
शीला दीक्षित ने 1998 में इससे पहले दिल्ली कांग्रेस की कमान संभाली थी. उस समय राजनीतिक हालात ऐसे बन गए थे कि पार्टी को लगातार विभिन्न चुनावों में शिकस्त का सामना करना पड़ रहा था. इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 1991, 1996 और 1998 के लोकसभा, 1993 के विधान सभा और 1997 नगर निगम चुनावों में भी कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा था.
शीला दीक्षित की पुरानी प्रोफाइल को देखते हुए कांग्रेस हाईकमान ने उन्हें दिल्ली का नेतृत्व सौंपने का फैसला किया है. वह 15 वर्षों तक लगातार मुख्यमंत्री रहीं. इसी दौरान दिल्ली का पूरा इंफ्रास्ट्रक्चर बदलने का श्रेय उन्हें दिया जाता है. अपने प्रशासनिक अनुभव की बदौलत उन्होंने आलाकमान को अपने पर दोबारा भरोसा दिलाया है. क्योंकि उनके कामकाज को लेकर कोई विवाद देखने को नहीं मिलता है. उन्हें एक बेहतर मैनेजर माना जाता है. अपने पुराने तजुर्बों को लेकर कॉन्फिडेंस से भरी नजर आती हैं. ‘आजतक’ के इस सवाल पर वह कहती भी हैं कि, ‘आलाकमान को लगता है कि मुझे दिल्ली का अनुभव है और यही कारण है कि उन्होंने नई दिल्ली कांग्रेस प्रमुख के लिए मुझे चुना.’
बीजेपी को सत्ता से बेदखल करने के लिए विभिन्न राज्यों में विपक्षी दलों का एकजुट होने का क्रम शुरू हो गया है. कांग्रेस महागठबंधन की पूरजोर तरफदारी कर रही है. वह बिहार में महागठबंधन खड़ा कर चुकी है. हालांकि शीला दीक्षित अपनी सियासी रणनीति का खुलासा नहीं कर रही हैं. दिल्ली में कांग्रेस के पास लोकसभा और विधानसभा में एक भी सीट नहीं है. इस स्थिति में अगले चुनाव की रणनीति पर वह कहती हैं कि, ‘दिल्ली में गठबंधन पर चर्चा चल रही है और जब वक्त आएगा तो पता चल जाएगा.’
दरअसल, भारतीय पारी के दौरान खलील अहमद और युजवेंद्र चहल मैदान पर ड्रिंक्स लेकर आए थे. इस बीच खलील ने एक गलती कर दी. वह पिच पर दौड़ गए. इस पर धोनी गुस्से में आ गए और उन्होंने खलील को ऐसा न करने की नसीहत देते हुए 'कुछ ऐसा कहा' कि उनका वीडिया वायरल हो गया.
ऐसा पहली बार नहीं, जब पूर्व कप्तान धोनी मैदान पर अपने साथी खिलाड़ी पर भड़कने से सुर्खियों में आए. इससे पहले फरवरी 2018 में उन्होंने दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ टी-20 मैच के दौरान मनीष पांडे को 'डांट' लगाई थी.
तब हुआ यूं था कि मैच के आखिरी ओवर में धोनी स्ट्राइक पर थे, उन्होंने स्कोर बोर्ड की ओर देख रहे मनीष पांडे को डांट लगाई थी. उन्होंने मनीष पांडे से कहा था- ओए, उधर क्या देख रहा, इधर देख ले... धोनी का ये वीडियो भी सोशल मीडिया पर वायरल हुआ था.
राष्ट्रीय स्तर पर जिस तरह की राजनीतिक तस्वीर फिलहाल बनी हुई है, उसमें कांग्रेस समेत विपक्ष में खड़े सभी क्षेत्रीय दल गठबंधन में चुनाव लड़ने की कोशिश कर रहे हैं. बिहार और उत्तर प्रदेश में गठबंधन की घोषणा भी की जा चुकी है. इन्हीं सरगर्मियों के बीच दिल्ली में यह कयास लगाए गए कि क्या लोकसभा चुनाव में कांग्रेस अपने प्रतिद्वंद्वी नई नवेली आम आदमी पार्टी से गठबंधन करेगी? सियासी गलियारे में इसकी सुगबुगाहट सुनने को मिली की कांग्रेस इस पर विचार कर सकती है. लेकिन सवाल है कि क्या कांग्रेस आम आदमी पार्टी से गठबंधन करेगी? उस आम आदमी पार्टी से, जो कांग्रेस के खिलाफ भ्रष्टाचार को लेकर चले आंदोलन की गर्भ से पैदा हुई है. भ्रष्टाचार विरोधी अन्ना आंदोलन से न सिर्फ आम आदमी पार्टी पैदा हुई बल्कि विधानसभा चुनावों में उसने कांग्रेस को अर्श से फर्श पर ला खड़ा किया और पार्टी का कोई इकलौता उम्मीदवार विधायक नहीं चुना जा सका.
आम आदमी पार्टी से मिली सियासी चोट को दिल्ली की कमान संभाल चुके अजय माकन संभवतः बखूबी महसूस कर रहे होंगे. इसलिए वह आम आदमी पार्टी से गठबंधन के खिलाफ थे. पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह भी अपने राज्य में अरविंद केजरीवाल से दोस्ती को हरी झंडी दिखाने से मना कर चुके हैं. शीला दीक्षित भी इसके खिलाफ ही नजर आत रही हैं. ‘आजतक’ से एक बातचीत में वह कहती हैं, ‘कांग्रेस अपने आप में सक्षम है. हमें किसी से गठबंधन करने की कोई आवश्यकता नहीं है. आम आदमी पार्टी का जो रिकॉर्ड रहा है, वो हमें प्रेरित नहीं करता है. हमने कभी भी आम आदमी पार्टी का समर्थन नहीं किया. उसने हमारे खिलाफ चुनाव लड़ा.’
मगर कहा यह भी जाता है कि राजनीति में कुछ भी मुमकिन है क्योंकि यहां कोई स्थायी दुश्मन या स्थायी जैसी कोई चीज नहीं होती है. अगर ये सूरत बने कि दिल्ली में लोकसभा चुनावों के लिए कांग्रेस को आम आदमी पार्टी से गठबंधन करना पड़ जाए तो फिर सवाल होगा है कि विधानसभा चुनाव में क्या? क्या दोनों दल एक साथ चुनावी मैदान में उतरेंगे? या फिर दोनों की राहें जुदा होंगी?
उम्र के इस पड़ाव पर कितनी कारगर होंगी दीक्षित
शीला दीक्षित ने 1998 में इससे पहले दिल्ली कांग्रेस की कमान संभाली थी. उस समय राजनीतिक हालात ऐसे बन गए थे कि पार्टी को लगातार विभिन्न चुनावों में शिकस्त का सामना करना पड़ रहा था. इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 1991, 1996 और 1998 के लोकसभा, 1993 के विधान सभा और 1997 नगर निगम चुनावों में भी कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा था.
शीला दीक्षित की पुरानी प्रोफाइल को देखते हुए कांग्रेस हाईकमान ने उन्हें दिल्ली का नेतृत्व सौंपने का फैसला किया है. वह 15 वर्षों तक लगातार मुख्यमंत्री रहीं. इसी दौरान दिल्ली का पूरा इंफ्रास्ट्रक्चर बदलने का श्रेय उन्हें दिया जाता है. अपने प्रशासनिक अनुभव की बदौलत उन्होंने आलाकमान को अपने पर दोबारा भरोसा दिलाया है. क्योंकि उनके कामकाज को लेकर कोई विवाद देखने को नहीं मिलता है. उन्हें एक बेहतर मैनेजर माना जाता है. अपने पुराने तजुर्बों को लेकर कॉन्फिडेंस से भरी नजर आती हैं. ‘आजतक’ के इस सवाल पर वह कहती भी हैं कि, ‘आलाकमान को लगता है कि मुझे दिल्ली का अनुभव है और यही कारण है कि उन्होंने नई दिल्ली कांग्रेस प्रमुख के लिए मुझे चुना.’
बीजेपी को सत्ता से बेदखल करने के लिए विभिन्न राज्यों में विपक्षी दलों का एकजुट होने का क्रम शुरू हो गया है. कांग्रेस महागठबंधन की पूरजोर तरफदारी कर रही है. वह बिहार में महागठबंधन खड़ा कर चुकी है. हालांकि शीला दीक्षित अपनी सियासी रणनीति का खुलासा नहीं कर रही हैं. दिल्ली में कांग्रेस के पास लोकसभा और विधानसभा में एक भी सीट नहीं है. इस स्थिति में अगले चुनाव की रणनीति पर वह कहती हैं कि, ‘दिल्ली में गठबंधन पर चर्चा चल रही है और जब वक्त आएगा तो पता चल जाएगा.’
Monday, January 7, 2019
किसे और कैसे मिलेगा लाभ? जानें सवर्ण आरक्षण से जुड़े हर सवाल का जवाब
नरेंद्र मोदी सरकार ने सोमवार को गरीब सवर्णों को आरक्षण देकर ऐतिहासिक निर्णय किया. लोकसभा चुनाव से ऐन पहले सरकार द्वारा आर्थिक आधार पर गरीब सवर्णों को सरकारी नौकरी और शिक्षा के क्षेत्र में 10 फीसदी आरक्षण दिया गया. विपक्ष ने सरकार के इस फैसले को सिर्फ एक चुनावी दांव बताया है, जबकि भारतीय जनता पार्टी और सरकार ने इसे ऐतिहासिक कदम करार दिया है. अगर आपके मन में इस फैसले से जुड़े कुछ सवाल हैं तो जवाब आपको यहां मिलेंगे...
1. सवर्णों को आरक्षण किसके हिस्से का मिलेगा?
मोदी सरकार ने गरीब सवर्णों को जो 10 फीसदी आरक्षण देने की बात कही है, यह आरक्षण अभी तक दिए जा रहे 50 फीसदी से अलग होगा. यानी, संविधान के अनुसार अभी तक सिर्फ 50 फीसदी आरक्षण दिया जाता है जो कि समाज के पिछड़े तबके को मिलता है. यानी सरकार ने सवर्णों को आरक्षण देने का फैसला इससे अलग दिया है, इसके लिए संविधान में संशोधन करना होगा.
2. संविधान में प्रावधान नहीं है फिर कैसे मिलेगा?
मोदी सरकार इस फैसले को लागू करने के लिए संविधान में संशोधन करेगी. मंगलवार को ही लोकसभा में संविधान संशोधित बिल पेश किया जाएगा. केंद्र सरकार संविधान के अनुच्छेद 15 और अनुच्छेद 16 में बदलाव करेगी. दोनों अनुच्छेद में बदलाव कर आर्थिक आधार पर आरक्षण देने का रास्ता साफ हो जाएगा.
3. क्या सिर्फ हिन्दू सवर्णों को मिलेगा?
ऐसा बिल्कुल नहीं है कि केंद्र सरकार के इस फैसले का लाभ हिंदू सवर्णों को मिलेगा. इस फैसले का लाभ हिंदुओं के अलावा मुस्लिम और ईसाई धर्म के लोगों को भी मिलेगा. उदाहरण के तौर पर अगर कोई मुस्लिम सामान्य श्रेणी में आता है और वह आर्थिक रूप से कमजोर है तो उसे 10 फीसदी आरक्षण का फायदा मिलेगा.
4. पटेल-जाट-मराठा आंदोलन का अब क्या होगा?
बीते दिनों में पटेल-जाट-मराठाओं ने आरक्षण के लिए कई तरह के आंदोलन किए हैं. मोदी सरकार के फैसलों से इन्हें भी लाभ मिलेगा, क्योंकि ये सभी जातियां सवर्ण के अंतर्गत आती हैं. ऐसे में इन सभी जातियों को भी आर्थिक आधार पर 10 फीसदी का लाभ मिलेगा.
5. किसे गरीब माना जाएगा और किसे नहीं?
मोदी सरकार ने इस फैसले के साथ ही कुछ शर्तें भी लागू कर दी हैं. इस फैसले के तहत जिनकी आय 8 लाख रुपये सालाना से कम हो उन्हें इस फैसले का लाभ मिलेगा, इसके अलावा जिसके पास 5 हेक्टेयर से कम की जमीन होगी उन्हें भी 10 फीसदी आरक्षण का लाभ मिलेगा.
जिन सवर्णों के पास 1000 स्क्वायर फीट से कम का घर होगा, जिनके पास निगम की 109 गज से कम अधिसूचित जमीन होगी, 209 गज से कम की गैर-अधिसूचित जमीन होगी और जो भी किसी आरक्षण के अंतर्गत नहीं आते होंगे उन सभी को इसका लाभ मिलेगा.
6. क्या कोर्ट में सरकार का ये दांव टिक पाएगा?
दरअसल, संविधान के अनुसार आरक्षण सिर्फ सामाजिक असमानता के आधार पर दिया जाता है यानी आर्थिक आधार पर मिलने वाला आरक्षण गैर-संवैधानिक है. कई राज्य सरकारों ने आर्थिक आधार पर आरक्षण देने की कोशिश की है, लेकिन जब मामला कोर्ट में जाता है तो गैर-संवैधानिक होने के आधार पर खारिज कर दिया जाता गया है. ऐसे में केंद्र सरकार के सामने संविधान में संशोधन करने की चुनौती होगी.
7. किन नौकरियों में ये आरक्षण मिलेगा, केंद्र-राज्य या निगमों की?
मोदी सरकार का ये लाभ सरकारी नौकरियों और शिक्षा के क्षेत्र में मिलेगा. मोदी सरकार का ये फैसला पूरे देश में लागू होगा, ऐसे में जिन क्षेत्रों में आरक्षण का प्रावधान है उसमें केंद्र-राज्य और निगम की नौकरी में इस फैसले का लाभ सीधे तौर पर मिलेगा.
8. क्या राज्य भी दे सकेंगे ऐसा आरक्षण?
पिछले कुछ समय में राज्य सरकारों ने जब भी आर्थिक आधार पर आरक्षण देने की कोशिश की है तो कोर्ट ने उसे गैरकानूनी करार दिया है. ऐसे में अगर अब इसको लेकर संविधान में संशोधन किया जाता है, तो फिर राज्य सरकारों के लिए 50 फीसदी से अलग आरक्षण देने का रास्ता खुल सकता है.
1. सवर्णों को आरक्षण किसके हिस्से का मिलेगा?
मोदी सरकार ने गरीब सवर्णों को जो 10 फीसदी आरक्षण देने की बात कही है, यह आरक्षण अभी तक दिए जा रहे 50 फीसदी से अलग होगा. यानी, संविधान के अनुसार अभी तक सिर्फ 50 फीसदी आरक्षण दिया जाता है जो कि समाज के पिछड़े तबके को मिलता है. यानी सरकार ने सवर्णों को आरक्षण देने का फैसला इससे अलग दिया है, इसके लिए संविधान में संशोधन करना होगा.
2. संविधान में प्रावधान नहीं है फिर कैसे मिलेगा?
मोदी सरकार इस फैसले को लागू करने के लिए संविधान में संशोधन करेगी. मंगलवार को ही लोकसभा में संविधान संशोधित बिल पेश किया जाएगा. केंद्र सरकार संविधान के अनुच्छेद 15 और अनुच्छेद 16 में बदलाव करेगी. दोनों अनुच्छेद में बदलाव कर आर्थिक आधार पर आरक्षण देने का रास्ता साफ हो जाएगा.
3. क्या सिर्फ हिन्दू सवर्णों को मिलेगा?
ऐसा बिल्कुल नहीं है कि केंद्र सरकार के इस फैसले का लाभ हिंदू सवर्णों को मिलेगा. इस फैसले का लाभ हिंदुओं के अलावा मुस्लिम और ईसाई धर्म के लोगों को भी मिलेगा. उदाहरण के तौर पर अगर कोई मुस्लिम सामान्य श्रेणी में आता है और वह आर्थिक रूप से कमजोर है तो उसे 10 फीसदी आरक्षण का फायदा मिलेगा.
4. पटेल-जाट-मराठा आंदोलन का अब क्या होगा?
बीते दिनों में पटेल-जाट-मराठाओं ने आरक्षण के लिए कई तरह के आंदोलन किए हैं. मोदी सरकार के फैसलों से इन्हें भी लाभ मिलेगा, क्योंकि ये सभी जातियां सवर्ण के अंतर्गत आती हैं. ऐसे में इन सभी जातियों को भी आर्थिक आधार पर 10 फीसदी का लाभ मिलेगा.
5. किसे गरीब माना जाएगा और किसे नहीं?
मोदी सरकार ने इस फैसले के साथ ही कुछ शर्तें भी लागू कर दी हैं. इस फैसले के तहत जिनकी आय 8 लाख रुपये सालाना से कम हो उन्हें इस फैसले का लाभ मिलेगा, इसके अलावा जिसके पास 5 हेक्टेयर से कम की जमीन होगी उन्हें भी 10 फीसदी आरक्षण का लाभ मिलेगा.
जिन सवर्णों के पास 1000 स्क्वायर फीट से कम का घर होगा, जिनके पास निगम की 109 गज से कम अधिसूचित जमीन होगी, 209 गज से कम की गैर-अधिसूचित जमीन होगी और जो भी किसी आरक्षण के अंतर्गत नहीं आते होंगे उन सभी को इसका लाभ मिलेगा.
6. क्या कोर्ट में सरकार का ये दांव टिक पाएगा?
दरअसल, संविधान के अनुसार आरक्षण सिर्फ सामाजिक असमानता के आधार पर दिया जाता है यानी आर्थिक आधार पर मिलने वाला आरक्षण गैर-संवैधानिक है. कई राज्य सरकारों ने आर्थिक आधार पर आरक्षण देने की कोशिश की है, लेकिन जब मामला कोर्ट में जाता है तो गैर-संवैधानिक होने के आधार पर खारिज कर दिया जाता गया है. ऐसे में केंद्र सरकार के सामने संविधान में संशोधन करने की चुनौती होगी.
7. किन नौकरियों में ये आरक्षण मिलेगा, केंद्र-राज्य या निगमों की?
मोदी सरकार का ये लाभ सरकारी नौकरियों और शिक्षा के क्षेत्र में मिलेगा. मोदी सरकार का ये फैसला पूरे देश में लागू होगा, ऐसे में जिन क्षेत्रों में आरक्षण का प्रावधान है उसमें केंद्र-राज्य और निगम की नौकरी में इस फैसले का लाभ सीधे तौर पर मिलेगा.
8. क्या राज्य भी दे सकेंगे ऐसा आरक्षण?
पिछले कुछ समय में राज्य सरकारों ने जब भी आर्थिक आधार पर आरक्षण देने की कोशिश की है तो कोर्ट ने उसे गैरकानूनी करार दिया है. ऐसे में अगर अब इसको लेकर संविधान में संशोधन किया जाता है, तो फिर राज्य सरकारों के लिए 50 फीसदी से अलग आरक्षण देने का रास्ता खुल सकता है.
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